0:00कि रमेश शर्मा व्यास और आज के इस
0:03कार्यक्रम में हम बात करेंगे
0:06गुरु जो है वह अपराध किया और गुरु शब्द को
0:11लेकर ऐसा भी कहा जाता है कि वह जो अंधकार
0:14को दूर करके प्रकाश खिलाता है तो कई बार
0:17हम यह समझते हैं कि समय सबसे बड़ा शिक्षक
0:20है समय की शिक्षा को ग्रहण करने के लिए जो
0:25शिष्त्त्व चाहिए वह कैसे हमारी अंदर
0:28विकसित हैं उसके बारे में और गुरु की
0:31महिमा के बारे में बातचीत करने के लिए आज
0:33हम ने आमंत्रित किया है हमारे मित्र वेदिक
0:38स्कॉलर और
0:40ब्रह्मर्षि महेश योगी जी के सान्निध्य
0:43मिला प्रवेश समिति जगदीश त्रिपाठी जी को
0:46है शिप्रा आपको नमस्कार जय गुरुदेव
0:49नमस्कार जय गुरुदेव गुरुदेव का श्रवण करते
0:53हुए आप बताएं अपने जीवन में जो आप पर
0:57गुरुकुल में रहे और एक का महर्षि
1:00मैं उनका सानिध्य आप को मिला
1:04क्या विशिष्ट बात रहती है जीवन में बबोई
1:08अच्छे अभिनेताओं में लाइटेंड बीन कहते हैं
1:12या
1:13पहुंचे हुए बॉल अधिवेशन में कहते हैं उनका
1:17सामीप्य मिले तो उसकी क्या विशाल
1:23आपके इस प्रश्न के उत्तर में मेरी तरफ से
1:27यह है कि
1:30कि यह जान पाना भी कि क्या लाभ हुआ क्या
1:35हानि हुई
1:38है और इसका उत्तर सूजी में आना भी गुरु
1:44कृपा बिना संभव ही नहीं है
1:48तो
1:50मैं यह कहूंगा कि जो कुछ भी उत्तम या
1:56कल्याणकारी मेरे जीवन में है
1:59या किसी के भी जीवन महेश्वर शिव गुरु कृपा
2:03ही है
2:05हैं तो
2:07एक कप स्तोत्र की ओर लास्ट की दो लाइनें
2:12मुझे स्मरण में हो रही है
2:14गुरु और कृपा ही केवलम
2:18केवल केवल मात्र गुरु कृपा है
2:24है जो आपको
2:26आप आपके जीवन में
2:30और सुख की अनुभूति या कल्याणकारी अनुभूति
2:35या फिर
2:36नीर-क्षीर विवेक का अनुभव
2:39ज्ञान देती है वह गुरु कृपा से ही प्राप्त
2:44हो सकती हैं और अनेक अनेक दिशाओं से अनेक
2:50अनेक तरह से और अनेक अनेक रूपों में गुरु
2:56आपके जीवन को प्रकाशित और प्रभावित करते
3:00हैं तो मैं मानता हूं कि गुरु अनेक दिशाओं
3:04से अनेक तरह से अनेक भूमिकाओं में आपके
3:08जीवन में
3:09आधार करते हैं और आपको जानते हैं
3:13गुरु की ओर
3:16लौटते हुए पहले आपके साथ
3:19जैसे कि स्थल है जहां पर
3:25अश्लील शब्द
3:30लोग अपना स्वीकार लेते हैं उसके बाद जो
3:34लोग ज्ञान की धारा का प्रवाह होता है अब
3:38हमने यह सकता है दोनों इग्नोर कृष्ण उनके
3:43प्रश्न यह है कि
3:46शिष्यत्व नहीं होगा तो गुरु की वृद्धि का
3:50लाभ भी नहीं मिल पाएगा तो थी तब होंगे जब
3:54शिक्षक को
3:56पहले तो आप यह बताएं कि अच्छा कौन है और
4:01शिष्य बनने के लिए
4:03सजगतापूर्वक क्या किया जा सकता है
4:07कि अब मेरी यह मान्यता है कि अच्छा शिष्य
4:10होने के लिए अपने आपको
4:14एक खूबसूरत मुझे पूरा तो स्मरण नहीं है पर
4:19मैं कहूंगा समिति पाणी श्रोत्रिय
4:21ब्रह्मनिष्ठ हम तो ऐसे कहां यह जब को
4:27उपनयन संस्कार
4:29करते हैं हम अपने बुरे संस्कारों में
4:33उपनयन संस्कार एक बड़ा संस्कार माना गया
4:35है इसमें वेदारंभ संस्कार भी उसमें
4:38सम्मिलित होता है तो उसमें
4:41एक-एक समय धन जो है ना वह उसको दिया जाता
4:47है
4:48इसको ओपन होता है
4:51है तो यह कहा कि इस विधेयक को
4:56सूखे सूखे लकड़ी की भांति दंडवत होना
4:59चाहिए मतलब यह है कि मैं कुछ नहीं जानता
5:03है वह बिल्कुल आप और है उसमें कोई बोध
5:07नहीं और जो निर्भय वह करके गुरुओं की
5:12सन्निधि को प्राप्त करेगा गुरु की शरण को
5:14प्राप्त करें मतलब यह है कि वह खाली घड़ा
5:19भी
5:21तरफ
5:22भागने अपना सब कुछ छोड़ नहीं सकते तो उसको
5:27आपने तरफ से कि मैं कुछ नहीं जानता हूं
5:30मैं बिल्कुल
5:32सब्सक्राइब की थी तो इस तरह से आप
5:36में जाता है तो फिर शुरू अपनी तरफ से
5:48आपके लिए
5:51दूसरा और गहराई में जाते हुए यह रहता है
5:54कि आप अहंकार से परे जाने की बात कर रहे
5:56हैं क्योंकि मैं जानता हूं मैं यह कर चुका
5:59हूं मैं ऐसा हूं यह वाला जो है वह कहीं पर
6:02भी देता है और फिर जो गुरु का संकेत है वह
6:08पकड़ने की जरूरत नहीं रह जाती है अब
6:11प्रश्न यह है कि
6:12गुरु की कृपा के बिना संभव नहीं कि कोई
6:16शिष्य आ रही हो और कई बार ऐसा लग रहा है
6:22कि इस युग में प्रत्येक में रहता हूं कि
6:28दिनांक तरफ
6:32सफल होना उपलब्धि अर्जित करने के धार्मिक
6:37कार्यक्रम घोषित होने की स्थिति में
6:44आवश्यक है
6:49है तो यह अहंकार के रूप में जब यह लगता है
6:51कि आवश्यक है कि तो वह निर्मल चित्त में
6:56यह बात तो आ ही नहीं सकती है तो मैं यह
7:01मानता हूं कि
7:03आवश्यक और अनावश्यक था यह दोनों ही चीजे
7:09व्यक्ति गुरुदेव पर ही छोड़ता है कि मेरे
7:14लिए क्या आवश्यक है क्या अनावश्यक मुझे
7:18मेरी क्या दिशा होनी चाहिए मेरी दिशा होनी
7:22चाहिए और मेरे जीवन का उद्धार इस राह में
7:26यह मैं नहीं जानता हूं यह संपूर्ण रूप से
7:30यदि वह गुरुदेव
7:33गुरु की पूर्ण कृपा
7:35कोण कोण
7:38सब्सक्राइब कीजिए लक्षण यह मानता है और
7:43कहीं ना कहीं इसी तरह
7:47इशारा करते हैं 123 शिष्य होने की पूरी
7:51तरह से एक जैसा आपका प्रश्न था कि अच्छे
7:54से सिक लक्षण कह तो मैं यह मानता हूं
7:57अच्छा
7:59स्वनियुक्त गुरु पर ही यह निर्णय छोड़
8:02देना कि आप मुझे क्या देना चाहते हैं कहां
8:08ले जाना चाहते और मेरी पात्रता को मैं
8:11क्या करूं आप कमेंट करें आप निर्णय करें
8:15कि मैं किस तरह की पात्रता को लेकर कहां
8:19जाऊं जैसे अ भगवत गीता का आपने उद्धरण
8:22दिया तो भगवान श्रीकृष्ण पर अर्जुन यही तो
8:27कहते हैं कि मैं कुछ नहीं जानता हूं
8:31सिस्ते हम शुकर मान तो आम प्रणव आप मुझ पर
8:36प्रसन्न होइए और मैं आपका सिस्टम आप मुझे
8:40दिशा दीजिए कि मुझे क्या करना है और फिर
8:43आप जो कहेंगे वही मैं करी शैव वैष्णव अंत
8:48में वर्ग तभी तो कहते हैं कि केशव अब हम
8:51मैं अपना सब कुछ छोड़ते हुए मैं एक निर्णय
8:55पर पहुंचा हूं कि अगर इससे वचनम् तत्व आ
8:59के वचन का पालन करना ही मेरी संपूर्ण
9:03ज्ञान की या मेरे मेरे होने की वह है तो
9:06आप जो कहेंगे वही मैं करूंगा श्री आप मुझे
9:10आप मेरी दिशा को तय करेगी और इसमें
9:14अपनी संगठनों को जोड़ते हुए इस प्रसंग से
9:17गुरु तत्वों के बारे में और आगे थोड़ा
9:21चिंतन करें विमर्शात्मक तो मैंने अपने
9:25गुरु से
9:26अयोध्या रूप में रिजर्व स्वामी ईश्वरानंद
9:29गिरि जी महाराज फिर तो अनिल कुमार सुना कि
9:32गुरु कोई व्यक्ति नहीं है तो गुरु क्षेत्र
9:35चुना है और वह व्यक्ति के रूप में हमारे
9:38सम्मूख होती है और हम कई बार जब आप यह
9:42कहना है कि जैसा वह कहें वैसा करें तो हम
9:45में से कई लोग ये सोचते हैं कि यह व्यक्ति
9:47है जो स्पष्ट निर्देश फिर है कि ऐसा करो
9:51वैसा करो और यह बात है गुरु शिष्य परंपरा
9:54में उच्च चेतना के चेतना से संपर्क की
9:58बातें तो झूठ जितना अधिक संवेदनात्मक रूप
10:02से शुद्ध हो गया होगा का यह 20 गुरु क्या
10:07करें वरना गुरु की बात की जगह पर भी
10:09अहंकार के नाम पर तो यह स्थिति के बारे
10:14में कुछ कहना है
10:16कि हमें यही कहना चाहूंगा कि
10:19यह इस तरह का है हम रामायण में एक कई
10:25प्रार्थना करते हैं भगवान श्री राम की और
10:29उसमें कहते हैं कि भक्तिं प्रयच्छ
10:32रघुपुंगव निर्भरां में काम आज दूसरे स्तंभ
10:36का निर्माण क्षमता और उसमें यह प्रार्थना
10:39की गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने कि हे
10:42राघव मुझे निर्भर भक्ति तो और उसका
10:45अभिप्राय है
10:46मैं संपूर्ण विश्व से संपूर्ण रूप से आप
10:51पर निर्भर
10:53पूरी तरह से आप निर्भर
10:56मानिए मैं आपको जब तक हम एक छोटी सी कहावत
11:03करते
11:04छोटे-बड़े
11:06रहें बुखारी हु
11:11छोटा होता है तरफ
11:16आ जाती है उसको अपने वश को बछड़े को और
11:20हमने देखा है ज्योतिष छोटे गांव में जन्मे
11:23तो गौशाला थी अभी भी गौशाला आपने देखा तो
11:27जब गाय का बछड़ा छोटा होता है तो गौ माता
11:31उसको चारों तरफ से घिरी रहती है मतलब वह
11:35शाम सुबह वह भागकर एक उसको पहचान कराने के
11:38लिए दौड़ती जब वह बड़ा हो जाता है उसको
11:40अपने पनकी हमने ही बड़ा तो होना ही है वह
11:44मैं उस अच्छी तरह परखा नहीं होना है पर वह
11:48गौमाता जब दूध पिला उसको बड़ा करती है तो
11:51फिर उसको दूध पीना फिर उसको तो मैं यह
11:56कहना चाहता हूं कि व्यक्ति जब तक गुरुदेव
12:01की कृपा और अपने आप को गुरुदेव के समक्ष
12:04संसार के सामने अश्लील
12:09रहना है और अपने गुरुदेव के समान अधिकार
12:14होने के पश्चात भी को बुद्धत्व को उपलब्ध
12:18होने के पश्चात भी वही वही स्थिति बनाए
12:23रखने कि गुरुदेव मैं तो आपका शिशु और उस
12:26अबोध शिशु की भारतीयों अभी भी बोध के
12:29बावजूद भी तो संसार यह समक्ष क्षेत्रों
12:32में सामर्थ्यवान हो चुका हूं गुरुदेव की
12:35कृपा से परंतु गुरुदेव के समक्ष उस चेतना
12:39के समग्र भले गुरुदेव रूप में न भी हो तो
12:43भी गुरुतत्त्व के समक्ष या गुरुता के
12:46समक्ष अपने आपको निर्दोष बहुत अबोध और
12:52शिशु मृत समझकर रखने से वह जो चेतना है
12:56गुरु तत्व है वह आपको चारों तरफ से घिरे
13:00रहते हैं और आप की दिशा आपको हमने जाने
13:03नहीं देगा और आपको और बोध की आवश्यकता
13:07सदैव है तुझ क्षणों आपको दिखा देंगे
13:10गुरुदेव और आपको सही दिशा में चलते रहिए
13:14मैं तुझ जैसे अंग्रेजी भाषा में कहें
13:17इंटरनल कंपनियों तो हम शुभांगी बात कर रहे
13:21हैं योग हमारे भीतर है और वहां के भीतर
13:23मुखरित हो इसके लिए जो सहन करनी चाहिए उस
13:27दिशा में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरूओं
13:30की विशेष रूप से मान्यता दी गई है बड़ी
13:34गुरु पूर्णिमा से थोड़ा सा अलग हटके जब हम
13:38ऐसा देखते हैं कि समय हर तरह की समस्या के
13:44समाधान के रूप में भी देखते हैं और काल को
13:47गुरु के रूप में भी कहा है दरअसल
13:50काल के साथ इतनी सारी बातें हैं तो कहते
13:54हैं जो इश्वर है वह उसको तो आदि-अंत सिर
13:57पर है तो काल में वह सीमित है नहीं और कॉल
14:01भी कहीं न कहीं उसी का यह स्वरूप है ऐसा
14:06भी कहा गया तो सार में प्रश्न किया आप
14:09शास्त्री जी की क्या समय को भी गुरु के
14:12रूप में लिया जा सकता है
14:14सऊदी गुरुतत्त्व सर्वव्यापक है और
14:18सर्वव्यापक है तो मतलब तो है ही और
14:22भगवान श्रीकृष्ण ने भगवत गीता में अर्जुन
14:25को
14:28लोकक्षयकृत्प्रवृध्दो लोकांसमाहर्तुमिह
14:32दक्षिण करने वाला उन्नति करने वाला हूं तो
14:37अभिप्राय है वहां तो भगवान श्री कृष्ण के
14:40रूप में उनको करने हैं तो स्वभाविक है और
14:46समय गुरु है और इसी लिए आप देखेंगे कई बार
14:51हम लोग बात नहीं करते समय सब कुछ सिखा
14:55देता है
14:56समय सब समय सबसे बड़ा
15:01विघ्न गुरु और नहीं समय सबसे बड़ा शिक्षक
15:06है तो यह जो है ना अनुभूति ढेर समय आपको
15:11परिपक्व और
15:14कि प्रारंभ में हमने यह बात करी थी कि
15:18गुरु सर्वव्यापक है तो अकाल के रूप में भी
15:21आपको बोध देता है के रूप में भी होता है
15:24वह पिता के रूप में भी हो सकता है वह आपके
15:27के रूप में हो सकता है हमने इसी भ्रम में
15:33दत्तात्रेय जी के मुखारविंद से यह श्रवण
15:36किया कि उन्होंने कहा कि मैंने 24 गुरु
15:40बने
15:41और उनके गुरुओं की जो संघ तो
15:46उसमें कहते हैं कि एक वजह से भी कुछ मैंने
15:50लिए
15:51एक रहस्य यह कबूतर से भी पहाड़ से भी
15:56कन्या से भी तो आज से भी कुछ शिक्षा तो यह
16:00सब अलग-अलग पात्र हैं उनमें से जहां से
16:05कुछ आपको सद्गुण प्राप्त हो जाते हैं वह
16:09कितनी भी कैसी भी घटना हो तो वह हाथ को
16:12ग्रुप रूप में वहां से भी पूछ लो वृद्धि
16:15तो इस समय के हिसाब से एक काल में कोई न
16:19कोई घटना कोई टाइम आपको कुछ न कुछ सिखाता
16:22है इसलिए स्वभाविक है समय सबसे बड़ा गुरु
16:26हैं और गुरु सर्वव्यापक के तो काल के रूप
16:29में भी आपके जीवन को बोल देता है समय
16:32सिखाता है पर फिर वहां करती है कि अगर
16:35सीखने को हम तैयार हैं यह में सीखना आता
16:38है तो उसकी खाता होगा ऐसा यह कहते हुए आगे
16:42इन यह जिज्ञासा लेकर आप किस तरह शास्त्री
16:46जी की कई लोग समय से सीखते नहीं और कई लोग
16:49समय से बहुत अधिक जल्दी सीख जाते हैं शाम
16:52अपने व्यवहार जगत में देखते हैं आपने समय
16:55से क्या सीखा और
16:58ऐसा फाल
17:00कि ऐसी आंतरिक पुष्टि कैसे आए कि हम
17:06समय क्या कह रहा है उसको पढ़ सकें और उसके
17:10अनुरूप अपने जीवन को ढाल लेते हैं
17:13मैं तो इस समय से बहुत कुछ शिक्षा प्राप्त
17:17हुई है और अभी ऐसे नहीं है कि शिक्षा
17:21पूर्ण हो इससे अच्छा तो अनेक अनेक जन्म हम
17:25लेते रहेंगे और सीखेंगे तब तक वह चलती
17:29रहेगी तो समय से यह जानने क्लास की
17:34अनुभूति हुई कि जो चीज़ें हमने कल समझी थी
17:38कि यह जीवन के लिए अनुकूल हो सकती हैं वह
17:41समय का रक्त प्रवाह को प्रति पूर्ण होती
17:43तो अनुकूलता और प्रतिकूलता में संभव हो ना
17:48यह समय से शिक्षा ग्रहण करने का संदेश
17:54हमें प्राप्त होता है और प्राप्त करना
17:56चाहिए और यह भी समय एक सा नहीं रहता है वह
18:02एक जैसा नहीं रहेगा तो आपको किसी एक
18:06मस्जिद को यह समझ करके कि बस अब हो गया और
18:10यह सब कुछ ऐसा ही रहेगा और नहीं होने वाला
18:12है समय परिवर्तनशील है और परिवर्तन संसार
18:16का नियम है यह संस्था यह समय से शिक्षा
18:20ग्रहण करने का सबसे बड़ा अधार दिख समय
18:23परिवर्तनशील है और जीवन में सब कुछ
18:26परिवर्तन होगा आप आज प्रसन्न है यह
18:29प्रसन्नता आपकी सदा बनी रहेगी ऐसा नहीं है
18:32इसी तरह आप्रेशन है तो आपको शुद्धता सदा
18:35बनी रहेगी इसमें भी आप चेंज इसलिए
18:37निश्चिंत हो जाइए चिंता मत करिए और
18:41अहंकारशून्य रहिए अहंकार में भी मत चले
18:45जाइए और चिंतित लीवर को दो यह तो आप आनंद
18:48में रहें और प्रभु की प्रार्थना करते तो
18:51गुरु के संकल्प लेते हुए उस समय से सीख की
18:55बात करें तो हम नहीं यह बहुत बार सुना है
18:57कि जो इतिहास से सीखते नहीं है तो वह पुणे
19:02उस त्रासदी को भोगने के लिए अपने को
19:04प्रस्तुत कर सकते हैं तो इतिहास से सीखने
19:08की बार अपने स्थान पर है और नई पीढ़ी से
19:11भी बहुत कुछ सीखने की बाद मैं ऑफिस लिया
19:14वे तू क्योंकि जब तक अपनी कि योग है इस
19:18मुए दो बालक जो है छोटे-छोटे वह अपने
19:22माता-पिता अपने तारे की तुलना में अगर फोन
19:26में कोई ऐप डाउनलोड करना है या किस तरह से
19:29कंप्यूटर लैपटॉप पर कुछ करना तो उनको बहुत
19:31ज्यादा पता होता है पहले हम जो बच्चे तो
19:34मन में कहीं होता था कि जो बड़े हैं उनको
19:36अधिक पता है तो यह जो अधिक पता होना है वह
19:40भी एक प्रकार से सम्मान बनाए रखने का एक
19:45कारण होता था अनिवार्य रूप से समुद्र वैसा
19:48नहीं है लेकिन फिर भी इस दृष्टि से आपको
19:52क्या लगता है कि आने वाली युवा पीढ़ी का
19:54दृष्टिकोण है उससे क्या सीखा जाए जाना
19:59चाहिए
20:01यह देखिए यह तो
20:03ऐप डाउनलोड हो जाना या टेलीफोन कुछ चला
20:07रहना या कंप्यूटर को चला रहे ना यह बहुत
20:10अच्छी अंग्रेजी बोलना या बहुत सारी भाषाओं
20:13को जान लेना यह गलत बात है मैं ऐसा मानता
20:17हूं और जीवन को समय के साथ में जीवन को
20:22बोध हमें जीने का झाला जो नजरिया है जो
20:29उम्र में जो बड़े लोग हैं उन्होंने जीवन
20:33को करके वह सारे अनुभव प्राप्त किया तो
20:37जैसे कि अगर कोई व्यक्ति
20:40वो डाउनलोड तो कर लेता है लेकिन
20:44वास्तव में उसे जीवन को है
20:49तो वह दूसरों की अपेक्षा मैं कहूंगा कि वह
20:54है सिर्फ वह टेक्निकल तो कर सकता है लेकिन
20:58वास्तव में जीवन के लिए गैस को जीवन की
21:03आपाधापी में जाकर के जीवन को कैसे सुलझा
21:06हुआ व्यक्तित्व बनना है वह तो अनुभव से ही
21:10आएगा और गुरु की सन्निधि में रहकर ही आएगा
21:14तो चलते-चलते डुबो गुरु पूर्णिमा उत्सव
21:18मनाया जाता है उसको आप कितना महत्वपूर्ण
21:21मानते हैं और इसके साथ को व्यास पूर्णिमा
21:24भी कहते हैं तो यह संस्कृत में बताएं कि
21:28व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं और
21:32जो योग के जरिए भारतीय संस्कृति की दृष्टि
21:37से उसके बारे में कुछ है
21:40का विषय है कि हमारे याशिका भाषाओं सिस्टम
21:44जगत्सर्वं ऐसा कहा कि महर्षि वेद व्यास ने
21:50अब भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति को
21:56अक्षुण विस्तार दिया और दूसरे जितने
22:00ग्रंथों की रचना की हमारी संस्कृति को
22:03हमारे
22:04सनातन संस्कृति को और सनातन संस्कृति तो
22:09आज हमें कहना पड़ रहा है कि वे
22:13सब्सक्राइब की रचना की थी मानव मात्र के
22:18लिए कि
22:20उस समय कोई दूसरे धर्म इस पृथ्वी पर नहीं
22:25थे महर्षि वेदव्याश महर्षी
22:28वेदव्यास ने ना सिर्फ मानव मात्र के लिए
22:33जीवन मात्र कि युद्ध जीने की विधि बताई थी
22:38जो सनातन धर्म हां यह और सनातन संस्कृति
22:42के रूप में आज हमारे समक्ष है तो स्वभाविक
22:46है कि हमें इन विधियों के द्वारा जिसके
22:49कारण हम मानव हैं हम धनाभाव नहीं है तो आप
22:54जिन जिन महर्षि के कारण जिन-जिन रिषियों
22:58कि अ की कृपा के कारण हम उस परंपरा को
23:02लेकर चलना है हमारी परंपरा के जो
23:05संवाहक रहे हैं उनके प्रति कृतज्ञ होना
23:09उनके प्रति उनको धन्यवाद स्वरूप कृतज्ञता
23:13ज्ञापन करना है कि अगर वह न होते तो हमारी
23:17संस्कृति का अरे हम्म हम्म जिन्होंने जीवन
23:21मूल्यों को लेकर जीवन जी रहे हैं वह हमारे
23:23पास में होते और हमारी दिशा हमारी दशा कुछ
23:26अलग होती तो हम तो पथभ्रष्ट से लोग होते
23:30इसलिए व्यास पूर्णिमा पर महर्षि वेदव्यास
23:33को और उन्हीं वेदव्यास की
23:36परंपरा के संवाहक जो हमारे अपने जो कि मैं
23:40वह मुझे उन्हें व्यास की परंपरा के संवाहक
23:44है तो उनके उनके माध्यम से महर्षि
23:47वेदव्यास स्थित उनके प्रति कृतज्ञता के
23:51भाव को ज्ञापन करना और उनके चरणों में
23:53अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करना यही गुरु
23:56पूर्णिमा के ऊपर गुरु पूर्णिमा का महत्व
23:59है और मैं मानता हूं कि सबको इस दिन को
24:03अपने गुरुओं के प्रति का गठन होना है उनका
24:08बंधन अभिनंदन करना है और धन्यवाद स्वरूप
24:11और गुरुदेव का पूजन करना है और यह पूजन न
24:16सिर्फ वह यह है कि उनके
24:18चरणों में प्रणाम करके और उस दिन त्यागी
24:22वर्णन करने इतना ही नहीं अपने जीवन में उन
24:25जीवन मूल्यों को उतारते हुए जीवन को जीना
24:28आप उस तरह से जैसा उन्होंने हमें संदेश
24:31दिया वसुंधरा ने बताया अवशोषित जगदीश
24:34त्रिपाठी जी यह बाद भी
24:36अद्वितीय है कि करुणा जो है वह मनुष्य
24:40चाणक्य बनाती है और दैवी संपदा के संदर्भ
24:44को लेते हुए भी मैत्री दया करुणा मुदिता
24:47इत्यादि भी कुछ संघर्ष करते हैं पर जब हम
24:51आज के इस विमर्श का समापन कर रहे हैं तो
24:55भारतीय संस्कृति के अनुसार इन पंक्तियों
24:58में भी प्रकट होता है लगता है और हित सरिस
25:02धर्म नहीं भाई पर पीड़ा सम नहिं अधमाई
25:06दूसरे को नहीं पहुंचा दें और दूसरी के हित
25:11के बारे में सोच है यह मानवीय व संस्कृति
25:15का आधार जैसा आपने इसका कोई सनातन हिंदू
25:19संस्कृति कहना अब स्कूल में आवश्यक है घ्र
25:24जिस प्रकार का घाव बन गया तो यह तो मानव
25:28मात्र के लिए अनिवार्य है
25:31उसको उन्नत करने वाले
25:34संवेदनशील और दूसरे की पीड़ा आपके
25:40अपने गैलरी के द्वारा जो उनके गुरु पंडित
25:43श्रीराम शर्मा आचार्य जी की पंक्तियों कई
25:46वार किए हुए दूसरों के साथ वह व्यवहार न
25:50करें जो हमें अपने लिए पसंद नहीं मुझे यह
25:54सूत्रात्मक परल रूप में मुख्य भरते हैं और
25:58वह गार्लिक के साथ भी हमारे संबंधों को
26:01सुंदर बना टिप्स आए गुटीय चार्ज बहुत-बहुत
26:05धन्यवाद के साथ जय गुरुदेव प्रणाम जय
26:09गुरुदेव लुट गुरु के रूप में समय को
26:12अपनाने वाली सजगता हमारे साथ रहे तो वह
26:16प्रसन्न हो कोई छू नहीं सकता है इसलिए आज
26:19तक इसमें पुणे आपका आवश्यक कृष्ण होती है
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0:00कि रमेश शर्मा व्यास और आज के इस
0:03कार्यक्रम में हम बात करेंगे
0:06गुरु जो है वह अपराध किया और गुरु शब्द को
0:11लेकर ऐसा भी कहा जाता है कि वह जो अंधकार
0:14को दूर करके प्रकाश खिलाता है तो कई बार
0:17हम यह समझते हैं कि समय सबसे बड़ा शिक्षक
0:20है समय की शिक्षा को ग्रहण करने के लिए जो
0:25शिष्त्त्व चाहिए वह कैसे हमारी अंदर
0:28विकसित हैं उसके बारे में और गुरु की
0:31महिमा के बारे में बातचीत करने के लिए आज
0:33हम ने आमंत्रित किया है हमारे मित्र वेदिक
0:38स्कॉलर और
0:40ब्रह्मर्षि महेश योगी जी के सान्निध्य
0:43मिला प्रवेश समिति जगदीश त्रिपाठी जी को
0:46है शिप्रा आपको नमस्कार जय गुरुदेव
0:49नमस्कार जय गुरुदेव गुरुदेव का श्रवण करते
0:53हुए आप बताएं अपने जीवन में जो आप पर
0:57गुरुकुल में रहे और एक का महर्षि
1:00मैं उनका सानिध्य आप को मिला
1:04क्या विशिष्ट बात रहती है जीवन में बबोई
1:08अच्छे अभिनेताओं में लाइटेंड बीन कहते हैं
1:12या
1:13पहुंचे हुए बॉल अधिवेशन में कहते हैं उनका
1:17सामीप्य मिले तो उसकी क्या विशाल
1:23आपके इस प्रश्न के उत्तर में मेरी तरफ से
1:27यह है कि
1:30कि यह जान पाना भी कि क्या लाभ हुआ क्या
1:35हानि हुई
1:38है और इसका उत्तर सूजी में आना भी गुरु
1:44कृपा बिना संभव ही नहीं है
1:48तो
1:50मैं यह कहूंगा कि जो कुछ भी उत्तम या
1:56कल्याणकारी मेरे जीवन में है
1:59या किसी के भी जीवन महेश्वर शिव गुरु कृपा
2:03ही है
2:05हैं तो
2:07एक कप स्तोत्र की ओर लास्ट की दो लाइनें
2:12मुझे स्मरण में हो रही है
2:14गुरु और कृपा ही केवलम
2:18केवल केवल मात्र गुरु कृपा है
2:24है जो आपको
2:26आप आपके जीवन में
2:30और सुख की अनुभूति या कल्याणकारी अनुभूति
2:35या फिर
2:36नीर-क्षीर विवेक का अनुभव
2:39ज्ञान देती है वह गुरु कृपा से ही प्राप्त
2:44हो सकती हैं और अनेक अनेक दिशाओं से अनेक
2:50अनेक तरह से और अनेक अनेक रूपों में गुरु
2:56आपके जीवन को प्रकाशित और प्रभावित करते
3:00हैं तो मैं मानता हूं कि गुरु अनेक दिशाओं
3:04से अनेक तरह से अनेक भूमिकाओं में आपके
3:08जीवन में
3:09आधार करते हैं और आपको जानते हैं
3:13गुरु की ओर
3:16लौटते हुए पहले आपके साथ
3:19जैसे कि स्थल है जहां पर
3:25अश्लील शब्द
3:30लोग अपना स्वीकार लेते हैं उसके बाद जो
3:34लोग ज्ञान की धारा का प्रवाह होता है अब
3:38हमने यह सकता है दोनों इग्नोर कृष्ण उनके
3:43प्रश्न यह है कि
3:46शिष्यत्व नहीं होगा तो गुरु की वृद्धि का
3:50लाभ भी नहीं मिल पाएगा तो थी तब होंगे जब
3:54शिक्षक को
3:56पहले तो आप यह बताएं कि अच्छा कौन है और
4:01शिष्य बनने के लिए
4:03सजगतापूर्वक क्या किया जा सकता है
4:07कि अब मेरी यह मान्यता है कि अच्छा शिष्य
4:10होने के लिए अपने आपको
4:14एक खूबसूरत मुझे पूरा तो स्मरण नहीं है पर
4:19मैं कहूंगा समिति पाणी श्रोत्रिय
4:21ब्रह्मनिष्ठ हम तो ऐसे कहां यह जब को
4:27उपनयन संस्कार
4:29करते हैं हम अपने बुरे संस्कारों में
4:33उपनयन संस्कार एक बड़ा संस्कार माना गया
4:35है इसमें वेदारंभ संस्कार भी उसमें
4:38सम्मिलित होता है तो उसमें
4:41एक-एक समय धन जो है ना वह उसको दिया जाता
4:47है
4:48इसको ओपन होता है
4:51है तो यह कहा कि इस विधेयक को
4:56सूखे सूखे लकड़ी की भांति दंडवत होना
4:59चाहिए मतलब यह है कि मैं कुछ नहीं जानता
5:03है वह बिल्कुल आप और है उसमें कोई बोध
5:07नहीं और जो निर्भय वह करके गुरुओं की
5:12सन्निधि को प्राप्त करेगा गुरु की शरण को
5:14प्राप्त करें मतलब यह है कि वह खाली घड़ा
5:19भी
5:21तरफ
5:22भागने अपना सब कुछ छोड़ नहीं सकते तो उसको
5:27आपने तरफ से कि मैं कुछ नहीं जानता हूं
5:30मैं बिल्कुल
5:32सब्सक्राइब की थी तो इस तरह से आप
5:36में जाता है तो फिर शुरू अपनी तरफ से
5:48आपके लिए
5:51दूसरा और गहराई में जाते हुए यह रहता है
5:54कि आप अहंकार से परे जाने की बात कर रहे
5:56हैं क्योंकि मैं जानता हूं मैं यह कर चुका
5:59हूं मैं ऐसा हूं यह वाला जो है वह कहीं पर
6:02भी देता है और फिर जो गुरु का संकेत है वह
6:08पकड़ने की जरूरत नहीं रह जाती है अब
6:11प्रश्न यह है कि
6:12गुरु की कृपा के बिना संभव नहीं कि कोई
6:16शिष्य आ रही हो और कई बार ऐसा लग रहा है
6:22कि इस युग में प्रत्येक में रहता हूं कि
6:28दिनांक तरफ
6:32सफल होना उपलब्धि अर्जित करने के धार्मिक
6:37कार्यक्रम घोषित होने की स्थिति में
6:44आवश्यक है
6:49है तो यह अहंकार के रूप में जब यह लगता है
6:51कि आवश्यक है कि तो वह निर्मल चित्त में
6:56यह बात तो आ ही नहीं सकती है तो मैं यह
7:01मानता हूं कि
7:03आवश्यक और अनावश्यक था यह दोनों ही चीजे
7:09व्यक्ति गुरुदेव पर ही छोड़ता है कि मेरे
7:14लिए क्या आवश्यक है क्या अनावश्यक मुझे
7:18मेरी क्या दिशा होनी चाहिए मेरी दिशा होनी
7:22चाहिए और मेरे जीवन का उद्धार इस राह में
7:26यह मैं नहीं जानता हूं यह संपूर्ण रूप से
7:30यदि वह गुरुदेव
7:33गुरु की पूर्ण कृपा
7:35कोण कोण
7:38सब्सक्राइब कीजिए लक्षण यह मानता है और
7:43कहीं ना कहीं इसी तरह
7:47इशारा करते हैं 123 शिष्य होने की पूरी
7:51तरह से एक जैसा आपका प्रश्न था कि अच्छे
7:54से सिक लक्षण कह तो मैं यह मानता हूं
7:57अच्छा
7:59स्वनियुक्त गुरु पर ही यह निर्णय छोड़
8:02देना कि आप मुझे क्या देना चाहते हैं कहां
8:08ले जाना चाहते और मेरी पात्रता को मैं
8:11क्या करूं आप कमेंट करें आप निर्णय करें
8:15कि मैं किस तरह की पात्रता को लेकर कहां
8:19जाऊं जैसे अ भगवत गीता का आपने उद्धरण
8:22दिया तो भगवान श्रीकृष्ण पर अर्जुन यही तो
8:27कहते हैं कि मैं कुछ नहीं जानता हूं
8:31सिस्ते हम शुकर मान तो आम प्रणव आप मुझ पर
8:36प्रसन्न होइए और मैं आपका सिस्टम आप मुझे
8:40दिशा दीजिए कि मुझे क्या करना है और फिर
8:43आप जो कहेंगे वही मैं करी शैव वैष्णव अंत
8:48में वर्ग तभी तो कहते हैं कि केशव अब हम
8:51मैं अपना सब कुछ छोड़ते हुए मैं एक निर्णय
8:55पर पहुंचा हूं कि अगर इससे वचनम् तत्व आ
8:59के वचन का पालन करना ही मेरी संपूर्ण
9:03ज्ञान की या मेरे मेरे होने की वह है तो
9:06आप जो कहेंगे वही मैं करूंगा श्री आप मुझे
9:10आप मेरी दिशा को तय करेगी और इसमें
9:14अपनी संगठनों को जोड़ते हुए इस प्रसंग से
9:17गुरु तत्वों के बारे में और आगे थोड़ा
9:21चिंतन करें विमर्शात्मक तो मैंने अपने
9:25गुरु से
9:26अयोध्या रूप में रिजर्व स्वामी ईश्वरानंद
9:29गिरि जी महाराज फिर तो अनिल कुमार सुना कि
9:32गुरु कोई व्यक्ति नहीं है तो गुरु क्षेत्र
9:35चुना है और वह व्यक्ति के रूप में हमारे
9:38सम्मूख होती है और हम कई बार जब आप यह
9:42कहना है कि जैसा वह कहें वैसा करें तो हम
9:45में से कई लोग ये सोचते हैं कि यह व्यक्ति
9:47है जो स्पष्ट निर्देश फिर है कि ऐसा करो
9:51वैसा करो और यह बात है गुरु शिष्य परंपरा
9:54में उच्च चेतना के चेतना से संपर्क की
9:58बातें तो झूठ जितना अधिक संवेदनात्मक रूप
10:02से शुद्ध हो गया होगा का यह 20 गुरु क्या
10:07करें वरना गुरु की बात की जगह पर भी
10:09अहंकार के नाम पर तो यह स्थिति के बारे
10:14में कुछ कहना है
10:16कि हमें यही कहना चाहूंगा कि
10:19यह इस तरह का है हम रामायण में एक कई
10:25प्रार्थना करते हैं भगवान श्री राम की और
10:29उसमें कहते हैं कि भक्तिं प्रयच्छ
10:32रघुपुंगव निर्भरां में काम आज दूसरे स्तंभ
10:36का निर्माण क्षमता और उसमें यह प्रार्थना
10:39की गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने कि हे
10:42राघव मुझे निर्भर भक्ति तो और उसका
10:45अभिप्राय है
10:46मैं संपूर्ण विश्व से संपूर्ण रूप से आप
10:51पर निर्भर
10:53पूरी तरह से आप निर्भर
10:56मानिए मैं आपको जब तक हम एक छोटी सी कहावत
11:03करते
11:04छोटे-बड़े
11:06रहें बुखारी हु
11:11छोटा होता है तरफ
11:16आ जाती है उसको अपने वश को बछड़े को और
11:20हमने देखा है ज्योतिष छोटे गांव में जन्मे
11:23तो गौशाला थी अभी भी गौशाला आपने देखा तो
11:27जब गाय का बछड़ा छोटा होता है तो गौ माता
11:31उसको चारों तरफ से घिरी रहती है मतलब वह
11:35शाम सुबह वह भागकर एक उसको पहचान कराने के
11:38लिए दौड़ती जब वह बड़ा हो जाता है उसको
11:40अपने पनकी हमने ही बड़ा तो होना ही है वह
11:44मैं उस अच्छी तरह परखा नहीं होना है पर वह
11:48गौमाता जब दूध पिला उसको बड़ा करती है तो
11:51फिर उसको दूध पीना फिर उसको तो मैं यह
11:56कहना चाहता हूं कि व्यक्ति जब तक गुरुदेव
12:01की कृपा और अपने आप को गुरुदेव के समक्ष
12:04संसार के सामने अश्लील
12:09रहना है और अपने गुरुदेव के समान अधिकार
12:14होने के पश्चात भी को बुद्धत्व को उपलब्ध
12:18होने के पश्चात भी वही वही स्थिति बनाए
12:23रखने कि गुरुदेव मैं तो आपका शिशु और उस
12:26अबोध शिशु की भारतीयों अभी भी बोध के
12:29बावजूद भी तो संसार यह समक्ष क्षेत्रों
12:32में सामर्थ्यवान हो चुका हूं गुरुदेव की
12:35कृपा से परंतु गुरुदेव के समक्ष उस चेतना
12:39के समग्र भले गुरुदेव रूप में न भी हो तो
12:43भी गुरुतत्त्व के समक्ष या गुरुता के
12:46समक्ष अपने आपको निर्दोष बहुत अबोध और
12:52शिशु मृत समझकर रखने से वह जो चेतना है
12:56गुरु तत्व है वह आपको चारों तरफ से घिरे
13:00रहते हैं और आप की दिशा आपको हमने जाने
13:03नहीं देगा और आपको और बोध की आवश्यकता
13:07सदैव है तुझ क्षणों आपको दिखा देंगे
13:10गुरुदेव और आपको सही दिशा में चलते रहिए
13:14मैं तुझ जैसे अंग्रेजी भाषा में कहें
13:17इंटरनल कंपनियों तो हम शुभांगी बात कर रहे
13:21हैं योग हमारे भीतर है और वहां के भीतर
13:23मुखरित हो इसके लिए जो सहन करनी चाहिए उस
13:27दिशा में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरूओं
13:30की विशेष रूप से मान्यता दी गई है बड़ी
13:34गुरु पूर्णिमा से थोड़ा सा अलग हटके जब हम
13:38ऐसा देखते हैं कि समय हर तरह की समस्या के
13:44समाधान के रूप में भी देखते हैं और काल को
13:47गुरु के रूप में भी कहा है दरअसल
13:50काल के साथ इतनी सारी बातें हैं तो कहते
13:54हैं जो इश्वर है वह उसको तो आदि-अंत सिर
13:57पर है तो काल में वह सीमित है नहीं और कॉल
14:01भी कहीं न कहीं उसी का यह स्वरूप है ऐसा
14:06भी कहा गया तो सार में प्रश्न किया आप
14:09शास्त्री जी की क्या समय को भी गुरु के
14:12रूप में लिया जा सकता है
14:14सऊदी गुरुतत्त्व सर्वव्यापक है और
14:18सर्वव्यापक है तो मतलब तो है ही और
14:22भगवान श्रीकृष्ण ने भगवत गीता में अर्जुन
14:25को
14:28लोकक्षयकृत्प्रवृध्दो लोकांसमाहर्तुमिह
14:32दक्षिण करने वाला उन्नति करने वाला हूं तो
14:37अभिप्राय है वहां तो भगवान श्री कृष्ण के
14:40रूप में उनको करने हैं तो स्वभाविक है और
14:46समय गुरु है और इसी लिए आप देखेंगे कई बार
14:51हम लोग बात नहीं करते समय सब कुछ सिखा
14:55देता है
14:56समय सब समय सबसे बड़ा
15:01विघ्न गुरु और नहीं समय सबसे बड़ा शिक्षक
15:06है तो यह जो है ना अनुभूति ढेर समय आपको
15:11परिपक्व और
15:14कि प्रारंभ में हमने यह बात करी थी कि
15:18गुरु सर्वव्यापक है तो अकाल के रूप में भी
15:21आपको बोध देता है के रूप में भी होता है
15:24वह पिता के रूप में भी हो सकता है वह आपके
15:27के रूप में हो सकता है हमने इसी भ्रम में
15:33दत्तात्रेय जी के मुखारविंद से यह श्रवण
15:36किया कि उन्होंने कहा कि मैंने 24 गुरु
15:40बने
15:41और उनके गुरुओं की जो संघ तो
15:46उसमें कहते हैं कि एक वजह से भी कुछ मैंने
15:50लिए
15:51एक रहस्य यह कबूतर से भी पहाड़ से भी
15:56कन्या से भी तो आज से भी कुछ शिक्षा तो यह
16:00सब अलग-अलग पात्र हैं उनमें से जहां से
16:05कुछ आपको सद्गुण प्राप्त हो जाते हैं वह
16:09कितनी भी कैसी भी घटना हो तो वह हाथ को
16:12ग्रुप रूप में वहां से भी पूछ लो वृद्धि
16:15तो इस समय के हिसाब से एक काल में कोई न
16:19कोई घटना कोई टाइम आपको कुछ न कुछ सिखाता
16:22है इसलिए स्वभाविक है समय सबसे बड़ा गुरु
16:26हैं और गुरु सर्वव्यापक के तो काल के रूप
16:29में भी आपके जीवन को बोल देता है समय
16:32सिखाता है पर फिर वहां करती है कि अगर
16:35सीखने को हम तैयार हैं यह में सीखना आता
16:38है तो उसकी खाता होगा ऐसा यह कहते हुए आगे
16:42इन यह जिज्ञासा लेकर आप किस तरह शास्त्री
16:46जी की कई लोग समय से सीखते नहीं और कई लोग
16:49समय से बहुत अधिक जल्दी सीख जाते हैं शाम
16:52अपने व्यवहार जगत में देखते हैं आपने समय
16:55से क्या सीखा और
16:58ऐसा फाल
17:00कि ऐसी आंतरिक पुष्टि कैसे आए कि हम
17:06समय क्या कह रहा है उसको पढ़ सकें और उसके
17:10अनुरूप अपने जीवन को ढाल लेते हैं
17:13मैं तो इस समय से बहुत कुछ शिक्षा प्राप्त
17:17हुई है और अभी ऐसे नहीं है कि शिक्षा
17:21पूर्ण हो इससे अच्छा तो अनेक अनेक जन्म हम
17:25लेते रहेंगे और सीखेंगे तब तक वह चलती
17:29रहेगी तो समय से यह जानने क्लास की
17:34अनुभूति हुई कि जो चीज़ें हमने कल समझी थी
17:38कि यह जीवन के लिए अनुकूल हो सकती हैं वह
17:41समय का रक्त प्रवाह को प्रति पूर्ण होती
17:43तो अनुकूलता और प्रतिकूलता में संभव हो ना
17:48यह समय से शिक्षा ग्रहण करने का संदेश
17:54हमें प्राप्त होता है और प्राप्त करना
17:56चाहिए और यह भी समय एक सा नहीं रहता है वह
18:02एक जैसा नहीं रहेगा तो आपको किसी एक
18:06मस्जिद को यह समझ करके कि बस अब हो गया और
18:10यह सब कुछ ऐसा ही रहेगा और नहीं होने वाला
18:12है समय परिवर्तनशील है और परिवर्तन संसार
18:16का नियम है यह संस्था यह समय से शिक्षा
18:20ग्रहण करने का सबसे बड़ा अधार दिख समय
18:23परिवर्तनशील है और जीवन में सब कुछ
18:26परिवर्तन होगा आप आज प्रसन्न है यह
18:29प्रसन्नता आपकी सदा बनी रहेगी ऐसा नहीं है
18:32इसी तरह आप्रेशन है तो आपको शुद्धता सदा
18:35बनी रहेगी इसमें भी आप चेंज इसलिए
18:37निश्चिंत हो जाइए चिंता मत करिए और
18:41अहंकारशून्य रहिए अहंकार में भी मत चले
18:45जाइए और चिंतित लीवर को दो यह तो आप आनंद
18:48में रहें और प्रभु की प्रार्थना करते तो
18:51गुरु के संकल्प लेते हुए उस समय से सीख की
18:55बात करें तो हम नहीं यह बहुत बार सुना है
18:57कि जो इतिहास से सीखते नहीं है तो वह पुणे
19:02उस त्रासदी को भोगने के लिए अपने को
19:04प्रस्तुत कर सकते हैं तो इतिहास से सीखने
19:08की बार अपने स्थान पर है और नई पीढ़ी से
19:11भी बहुत कुछ सीखने की बाद मैं ऑफिस लिया
19:14वे तू क्योंकि जब तक अपनी कि योग है इस
19:18मुए दो बालक जो है छोटे-छोटे वह अपने
19:22माता-पिता अपने तारे की तुलना में अगर फोन
19:26में कोई ऐप डाउनलोड करना है या किस तरह से
19:29कंप्यूटर लैपटॉप पर कुछ करना तो उनको बहुत
19:31ज्यादा पता होता है पहले हम जो बच्चे तो
19:34मन में कहीं होता था कि जो बड़े हैं उनको
19:36अधिक पता है तो यह जो अधिक पता होना है वह
19:40भी एक प्रकार से सम्मान बनाए रखने का एक
19:45कारण होता था अनिवार्य रूप से समुद्र वैसा
19:48नहीं है लेकिन फिर भी इस दृष्टि से आपको
19:52क्या लगता है कि आने वाली युवा पीढ़ी का
19:54दृष्टिकोण है उससे क्या सीखा जाए जाना
19:59चाहिए
20:01यह देखिए यह तो
20:03ऐप डाउनलोड हो जाना या टेलीफोन कुछ चला
20:07रहना या कंप्यूटर को चला रहे ना यह बहुत
20:10अच्छी अंग्रेजी बोलना या बहुत सारी भाषाओं
20:13को जान लेना यह गलत बात है मैं ऐसा मानता
20:17हूं और जीवन को समय के साथ में जीवन को
20:22बोध हमें जीने का झाला जो नजरिया है जो
20:29उम्र में जो बड़े लोग हैं उन्होंने जीवन
20:33को करके वह सारे अनुभव प्राप्त किया तो
20:37जैसे कि अगर कोई व्यक्ति
20:40वो डाउनलोड तो कर लेता है लेकिन
20:44वास्तव में उसे जीवन को है
20:49तो वह दूसरों की अपेक्षा मैं कहूंगा कि वह
20:54है सिर्फ वह टेक्निकल तो कर सकता है लेकिन
20:58वास्तव में जीवन के लिए गैस को जीवन की
21:03आपाधापी में जाकर के जीवन को कैसे सुलझा
21:06हुआ व्यक्तित्व बनना है वह तो अनुभव से ही
21:10आएगा और गुरु की सन्निधि में रहकर ही आएगा
21:14तो चलते-चलते डुबो गुरु पूर्णिमा उत्सव
21:18मनाया जाता है उसको आप कितना महत्वपूर्ण
21:21मानते हैं और इसके साथ को व्यास पूर्णिमा
21:24भी कहते हैं तो यह संस्कृत में बताएं कि
21:28व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं और
21:32जो योग के जरिए भारतीय संस्कृति की दृष्टि
21:37से उसके बारे में कुछ है
21:40का विषय है कि हमारे याशिका भाषाओं सिस्टम
21:44जगत्सर्वं ऐसा कहा कि महर्षि वेद व्यास ने
21:50अब भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति को
21:56अक्षुण विस्तार दिया और दूसरे जितने
22:00ग्रंथों की रचना की हमारी संस्कृति को
22:03हमारे
22:04सनातन संस्कृति को और सनातन संस्कृति तो
22:09आज हमें कहना पड़ रहा है कि वे
22:13सब्सक्राइब की रचना की थी मानव मात्र के
22:18लिए कि
22:20उस समय कोई दूसरे धर्म इस पृथ्वी पर नहीं
22:25थे महर्षि वेदव्याश महर्षी
22:28वेदव्यास ने ना सिर्फ मानव मात्र के लिए
22:33जीवन मात्र कि युद्ध जीने की विधि बताई थी
22:38जो सनातन धर्म हां यह और सनातन संस्कृति
22:42के रूप में आज हमारे समक्ष है तो स्वभाविक
22:46है कि हमें इन विधियों के द्वारा जिसके
22:49कारण हम मानव हैं हम धनाभाव नहीं है तो आप
22:54जिन जिन महर्षि के कारण जिन-जिन रिषियों
22:58कि अ की कृपा के कारण हम उस परंपरा को
23:02लेकर चलना है हमारी परंपरा के जो
23:05संवाहक रहे हैं उनके प्रति कृतज्ञ होना
23:09उनके प्रति उनको धन्यवाद स्वरूप कृतज्ञता
23:13ज्ञापन करना है कि अगर वह न होते तो हमारी
23:17संस्कृति का अरे हम्म हम्म जिन्होंने जीवन
23:21मूल्यों को लेकर जीवन जी रहे हैं वह हमारे
23:23पास में होते और हमारी दिशा हमारी दशा कुछ
23:26अलग होती तो हम तो पथभ्रष्ट से लोग होते
23:30इसलिए व्यास पूर्णिमा पर महर्षि वेदव्यास
23:33को और उन्हीं वेदव्यास की
23:36परंपरा के संवाहक जो हमारे अपने जो कि मैं
23:40वह मुझे उन्हें व्यास की परंपरा के संवाहक
23:44है तो उनके उनके माध्यम से महर्षि
23:47वेदव्यास स्थित उनके प्रति कृतज्ञता के
23:51भाव को ज्ञापन करना और उनके चरणों में
23:53अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करना यही गुरु
23:56पूर्णिमा के ऊपर गुरु पूर्णिमा का महत्व
23:59है और मैं मानता हूं कि सबको इस दिन को
24:03अपने गुरुओं के प्रति का गठन होना है उनका
24:08बंधन अभिनंदन करना है और धन्यवाद स्वरूप
24:11और गुरुदेव का पूजन करना है और यह पूजन न
24:16सिर्फ वह यह है कि उनके
24:18चरणों में प्रणाम करके और उस दिन त्यागी
24:22वर्णन करने इतना ही नहीं अपने जीवन में उन
24:25जीवन मूल्यों को उतारते हुए जीवन को जीना
24:28आप उस तरह से जैसा उन्होंने हमें संदेश
24:31दिया वसुंधरा ने बताया अवशोषित जगदीश
24:34त्रिपाठी जी यह बाद भी
24:36अद्वितीय है कि करुणा जो है वह मनुष्य
24:40चाणक्य बनाती है और दैवी संपदा के संदर्भ
24:44को लेते हुए भी मैत्री दया करुणा मुदिता
24:47इत्यादि भी कुछ संघर्ष करते हैं पर जब हम
24:51आज के इस विमर्श का समापन कर रहे हैं तो
24:55भारतीय संस्कृति के अनुसार इन पंक्तियों
24:58में भी प्रकट होता है लगता है और हित सरिस
25:02धर्म नहीं भाई पर पीड़ा सम नहिं अधमाई
25:06दूसरे को नहीं पहुंचा दें और दूसरी के हित
25:11के बारे में सोच है यह मानवीय व संस्कृति
25:15का आधार जैसा आपने इसका कोई सनातन हिंदू
25:19संस्कृति कहना अब स्कूल में आवश्यक है घ्र
25:24जिस प्रकार का घाव बन गया तो यह तो मानव
25:28मात्र के लिए अनिवार्य है
25:31उसको उन्नत करने वाले
25:34संवेदनशील और दूसरे की पीड़ा आपके
25:40अपने गैलरी के द्वारा जो उनके गुरु पंडित
25:43श्रीराम शर्मा आचार्य जी की पंक्तियों कई
25:46वार किए हुए दूसरों के साथ वह व्यवहार न
25:50करें जो हमें अपने लिए पसंद नहीं मुझे यह
25:54सूत्रात्मक परल रूप में मुख्य भरते हैं और
25:58वह गार्लिक के साथ भी हमारे संबंधों को
26:01सुंदर बना टिप्स आए गुटीय चार्ज बहुत-बहुत
26:05धन्यवाद के साथ जय गुरुदेव प्रणाम जय
26:09गुरुदेव लुट गुरु के रूप में समय को
26:12अपनाने वाली सजगता हमारे साथ रहे तो वह
26:16प्रसन्न हो कोई छू नहीं सकता है इसलिए आज
26:19तक इसमें पुणे आपका आवश्यक कृष्ण होती है
