0:00नमस्कार नवरात्रि के पर्व पर आपको मंगल
0:03कामनाएं प्रेषित करने के साथ-साथ इस
0:06कार्यक्रम में हम जानेंगे कि नवरात्रि
0:09पर्व की महिना महिमा क्या है नौ दिन के
0:12लिए जो मनाते हैं तो हम उसका किस तरह से
0:16इस उत्सव को मनाना चाहिए इसमें क्या-क्या
0:19ऐसे संकेत हैं जो हमारे जीवन के निर्माण
0:23में सहायक है इन सब बातों के साथ-साथ कुछ
0:26मंत्रोचार
0:28श्रवण का लाभ भी हम लेंगे उनकी उपस्थिति
0:30में जो शास्त्री जगदीश त्रिपाठी जी वैदिक
0:34स्कॉलर नमस्कार प्रणाम आपको नमस्ते जय
0:37श्री कृष्णा जय सियाराम जय अंबे तो अंबा
0:41मैया का स्मरण करते हुए ऐसा कौन सा श्लोक
0:46है जो आप जब नवरात्रि के पर्व पर पूजन
0:50करते हैं और बाद में मैंने कई बार देखा है
0:53आप जो व्याख्यान करते हैं तो एक है मंत्र
0:55जिसको आप सबसे दोहराने का अनुरोध भी करते
0:58हैं अ
1:00मैं मेरा प्रयास होता है कि हम अपनी
1:03पुरातन जो हमारी परंपरा में स्तुति रही है
1:08भगवती की और जो हमारे वैदिक ऋषियों ने तो
1:11मैं उसमें से विशेषकर भगवान आदि
1:14शंकराचार्य
1:15द्वारा की गई स्तुति जो भगवती की है उनको
1:18रिपीट करता उम से एक भगवती स्तोत्रम है और
1:23एक भवानी अष्टकम है तो उसम से बहुत सारे
1:26हैं पर मैं भवानी अष्टकम और भगवती स्तोत
1:30तो
1:30जिसमें उसकी दो लाइने मैं आपको बोल देता
1:34हूं जी जय भगवती देवी नमो
1:39वरदे जय पाप विनाशिनी बहु फल दे जय भगवति
1:48देवी नमो वरदे जय पाप विनाशिनी बहु फल दे
1:57जय शुंभ नि शुंभ कपाल धरे
2:03प्रमा तु देवी नरार हरे जय भगवती देवी नमो
2:12वरद जय पाप विनाशिनी बहु फल दे ये भगवती
2:19स्तोत्र की दो पंक्तियां प्रथम है जिनको
2:23मैं लोगों से कहता हूं कि इनको आप सब
2:26स्तुति की तरह
2:28गाए इसका शाब्दिक अर्थ मेरी समझ में आता
2:31है जय पाप विनाशिनी बहु फल दे तो इसका
2:34मतलब एक तो पाप का नाश करने वाली है और हम
2:37सब को फल की प्राप्ति की कामना तो रहती है
2:39और तरह तरह के फल है और कौन से ऐसे फल है
2:42जीवन को कल्याण प्रद बनाते हैं वो भी
2:45संकेत माता की कृपा से मिलता है
2:48पर नवरात्रि की तरफ बढ़ने जो पाप शब्द आता
2:51है ना तो किसको आप पाप मानते
2:55हैं मेरे मानने से य आप कहेंगे सब कुछ वह
3:00जो आप अपने
3:02लिए सुखद रूप से ग्रहण नहीं करते हो और
3:06दूसरों को देते हो जो कुछ भी आप अपनी
3:10आत्मा उद्धार के लिए अपने लिए चाहते हैं
3:14सुख पूर्वक उसका आप स्वागत करते हैं और
3:17चाहते हैं कि यह मुझे प्राप्त हो वह सब
3:21कुछ पुण्य है लगभग
3:24सब कुछ मतलब और जो
3:28आप नहीं चाहते अपने
3:32लिए वो लगभग मैं कहूंगा पाप जैसे वो एक दो
3:38पंक्तियां के आत्मन प्रति कुलानी परे शम न
3:43समाचरेत जो हमारी आत्मा के लिए हमारे
3:45स्वयं के लिए प्रतिकूल है वह हम दूसरों के
3:50साथ व्यवहार में न लाए न दे वो मैं समझता
3:55हूं पुण्य पाप की परिभाषा ठीक रहेगी जी
3:58थोड़ा मुझे स्मरण आता है आचार्य श्रीराम
4:01शर्मा जी जो गायत्री परिवार के संस्थापक
4:05के रूप में भी हम उनको जानते हैं तो सरल
4:07भाषा में व ऐसे कहते थे
4:09कि दूसरों के साथ वो व्यवहार ना करें जो
4:12हमें अपने लिए पसंद नहीं जी इसको नित्य
4:15बोलते थे तो मुझे ऐसे याद है और भी कुछ
4:18बोलते थे पर ये था दूसरों के साथ वो
4:20व्यवहार ना करें जो हमें अपने लिए पसंद
4:22नहीं तो आपने जो बात कही उसके एकदम
4:24समानांतर सा है और अपने जो शास्त्रों में
4:27आता है कि दूसरे को पीड़ा पहुंचाना पाप है
4:31और इस प्रकार
4:33से वो सब जो हम ऐसे अपने को सीमित देव मान
4:38ले कोई कोई बहुत सूक्ष्म स्तर पर उसको भी
4:41पाप मान लेते पर हम इधर आ जाते हैं
4:43क्योंकि पाप एक श्लोक मैंने सुना संतों के
4:48मुखारविंद
4:49से अष्टादश पुराणु व्यासस्य वचन द
4:55वयम परोपकाराय पुण्या पा पाय पर
5:01पीड़ना तो वोह अभिप्राय यह है कि 18
5:06पुराणों में महर्षि वेदव्यास जी ने यह दो
5:12बातें समझाने सिखाने के लिए 18 पुराणों की
5:17रचना की और दो बात ये कि परोपकाराय पुण्या
5:22दूसरे का हित दूसरे के आनंद का वर्धन करना
5:26पुण्य है और दूसरों को पीड़ा पाप है तो ये
5:31वही बिल्कुल सही बात है और हम जिस युग में
5:35है हम उन सब संदर्भों का भी उल्लेख ना भी
5:37करें पर किस प्रकार से आतताई बर्बरता
5:41पूर्ण व्यवहार कर देते हैं तो यह जो एक
5:44सनातन संस्कार है दूसरे के प्रति करुणा का
5:48उसका यदि थोड़ा अंश किसी के मन में हो तो
5:52वो दूसरे को इस जघन्य रूप से पीड़ा
5:56पहुंचाने की स्थिति में ना जाए और आप और
5:59मैं और और अभी जब अक्टूबर 2023 के महीने
6:03में नवरात्रि की तरफ बढ़ रहे तो उससे
6:06पूर्व जिस प्रकार इजराइल पर आक्रमण हुआ और
6:11वो सारे दृश्य भी कहीं ना कहीं हमारे बीच
6:13है पर उनको अलग हटाते हुए एक यह प्रार्थना
6:16कि सबको वो जैसे सद्बुद्धि आए और समन्वय
6:21का भाव जागे अब इस तरफ आ जाता हूं आपकी
6:24अनुमति से जो घट मेरे पास में भी दिखाई दे
6:27रहा है और घट स्थापन से नवरात्रि प्रारंभ
6:31करते हैं तो घट का स्वरूप भी मां के साथ
6:34कैसा उसका एक सांकेतिक भाव है तो यह है कि
6:39यह मंगल सूचक
6:42है उसमें जल पूरित करके तो वह जल जीवन है
6:47और इसमें पांच तत्त्वों का समावेश करते
6:51हुए िति जल पावक गगन समीरा तो हम ये देखते
6:56हैं कि जिसके सिवाय हमारे जीवन का कोई
6:59अस्तित्व नहीं है हम उन्हीं तत्त्वों का
7:03को पोषित और उनको ठीक करने की दृष्टि से
7:07हम अर्चना करते हैं तो घट मंगल सूचक है
7:11मंगल कलश है उसमें हम वरुण देवता का खास
7:15कर के आवाहन करते हैं और विशेषत उस घट में
7:19समस्त देवों का अर्चन करते हैं आपको भी यह
7:24मंत्र आपने भी कभी-कभी ये पूजन का क्रम
7:28करते हैं कि कलस मुखे विष्णु कंठ रुद
7:34समात
7:37मलेमा म
7:39मात कु सागरा सर्वे सपत दपा
7:52सुधरा समा अत्र गायत्री सावित्री शांति
7:57पुष्टि करी था ये जो कलश है मतलब इस कलश
8:02का घट का अभिप्राय है यह जो मंगल कलश है
8:06इसमें ब्रह्मा विष्णु महेश इत्यादि देवता
8:10समस्त मात्र समस्त सागर समस्त महान सब
8:14पर्वत सब
8:16नदियां समस्त देवियां सब का सब इस कलश में
8:22कुंभ में विराजमान हो और हम उन सबकी
8:26आराधना एक साथ समन्वित रूप से यहां पर कर
8:30सके हम उनके प्रति प्रणित होते हुए इन आठ
8:34नौ दिनों में
8:36समस्त देवताओं का समस्त तीर्थों का समस्त
8:40सागरों का वेदों का माताओं का सबको हम नमन
8:44करते रहे और इसको करते हुए भगवती अंबा का
8:47पूजन करें यह कलश की बहुत ही सुंदर है और
8:51जो विनय शलता है और समग्रता है वो दोनों
8:55इस मंत्र के द्वारा भी हमारे लिए रेखांकित
8:58होते हैं अब बढ़ते हैं कैसे प्रारंभ करना
9:03चाहिए नवरात्रि के पर्व
9:06का तो मुझे लगता है सुधी जन सब लोग जानते
9:12हैं मुझसे अधिक अनुभवी और जानने वाले लोग
9:16हैं क्योंकि परंतु इस वार्ता को हम कर रहे
9:18हैं और आपका प्रश्न है तो मैं अपनी जो
9:22छोटी मोटी अनुभव छोटी मोटी संतों के
9:25द्वारा सुनी बात है उसी के हिसाब से
9:27कहूंगा तो जैसा मैं करता हूं उसी तरह से
9:30कहूंगा तो प्रात काल परिवार सहित सजनों के
9:35सहित स्नान आदि करके हम सबको जरूर एक
9:40स्थान जो हमारे यहां लगभग सबके यहां लोगों
9:43ने अपना पूजा स्थल आराधना स्थल बनाया ही
9:46होता है तो उसको थोड़ा सा और स्वक्ष तो
9:49होता ही है स्वक्षता पूर्वक करके और एक
9:53नवीन वस्त्र कुछ एक चौकी पर बिछा लेना
9:57चाहिए और उसके ऊपर घट के लिए चावल या सप्त
10:03धान या धान्य कुछ भी धान्य के ऊपर एक थाली
10:07के ऊपर भी आप रख सकते हैं नहीं तो पाटले
10:10पर कपड़े को बिछा के उसके ऊपर कलश की
10:14स्थापना करनी चाहिए जिसमें कलश में आप जल
10:18पूरित करें और उसमें फिर आप अगर आपको
10:22उपलब्ध हो जाए आम के पंच पल्लव अगर
10:26प्राप्त हो तो ठीक है नहीं प्राप्त हो तो
10:28कम से कम आम के पत्ते मिले आम के पत्ते हम
10:31जहां जिस देश में बैठे हैं वहां सब सबके
10:33लिए सुलभ नहीं हो पाते तो पान के पत्ते
10:35मिल जाते तो पान के पत्ते पान के पत्ते ना
10:38मिले तो आपके आसपास जो वनस्पति है जो
10:42वृक्ष है उन वृक्षों के ही पत्तों को आप
10:45कलश में लगाए एक नार केल श्रीफल उसके ऊपर
10:49रखें और कलश को मौली बांधे और उसको चार
10:54तरफ से कुमकुम से चंदन करके और जो म मंत्र
10:59हो सके वो करके नहीं तो भगवान जो अभी
11:01मंत्र मैंने कहा था समस्त देवताओं
11:04काम वाहन करते हुए वहां पर उन्हें
11:07विराजमान करें और इस तरह से फिर एक अगर
11:10संभव है आप पूरे नौ दिन तक के लिए अखंड
11:13जोत जलाना चाहे तो अखंड दीपक की व्यवस्था
11:17करें और उसमें घी को पूरित करते रहे और
11:20फिर यह सब करके भगवती की प्रतिमा छवि या
11:26नहीं छवि या नहीं प्रतिमा है तो आप इस घट
11:29में ही भगवती के विराजमान होने का आवान
11:32करते हुए जो वो करें और फिर अपना जो
11:37स्तुति बन सके नवार्ण मंत्र का जप कर सकते
11:40हैं कम से कम एक माला दुर्गा सस्वती का
11:42रोज एक पाठ आप कर सकते हैं संपूर्ण दुर्गा
11:45सस्ती आपसे ना हो सके तो भगवती का कोई एक
11:50स्तोत्र आप रोज पाठ करें थोड़ा जप करें
11:54उपवास अगर कर सकते हैं तो उपवास करें
11:57नित्य प्रात काल थोड़ी पूजा इत्यादि करके
12:01सायंकाल भगवती की आराधना अर्चना वंदना
12:04करते हुए आरती करें इस तरह सेय आठन दिन आप
12:07व्यतीत कर स जी तो एक तो नवान मंत्र का
12:11उच्चारण थोड़ा बताए और अगर उसके बारे में
12:14और कुछ बात प्रेरित प्रेरणा आती तो नवान
12:17मंत्र तो आजकल एक सुविधा भी है कि आप सबके
12:20पास में ये यंत्र है मोबाइल रूपी और उस
12:23मोबाइल रूपी यंत्र से आप खोज सकते हैं गल
12:26से नवान मंत्र उसमें बहुत उच्चारण वाले भी
12:28मिल जाए
12:29लेकिन मैं उसको कह देता हूं ओम ए रिंग
12:35क्लींग चामुंडाय विचे ओ ए ह्र क्लिंग
12:41चामुंडाय विचे ओ ए रिंग कलिंग चा मुंडाय
12:48विच तो यह मंत्र है इस मंत्र का
12:52आप मन को एकाग्र करते हुए और पूरे मन को
12:56उसी मंत्र में भगवती में
12:59लगाते हुए और इसका अगर संभव है एक माला
13:03अधिक जप करें और जिनके लिए सुविधा जनक है
13:07जो समय निकाल सके भगवती की दुर्गा सस्ती
13:11का ी पाठ पूरा करें नहीं कर सके तो दुर्गा
13:14श सती में तीन चरित्र है प्रथम मध्यम और
13:18उत्तर तो प्रथम
13:21चरित्र का पाठ एक दिन कर ले दूसरे दिन
13:25मध्यम चरित्र का तीसरे दिन उत्तर चरित्र
13:28का
13:29इसी तरह फिर से प्रथम मध्यम उत्तर तो नौ
13:32दिन में दुर्गा सरसती के तीन पाठ आपके
13:35द्वारा संपादन हो जाएंगे तो इस तरह से
13:39आपका रोज दुर्गा स
13:41पा जी जो दुर्गा सरसती है वह कौन से पुराण
13:46में है मारकंडे मारकंडे पुराण में और इसका
13:50जो प्रारंभ होता है तो समाधि
13:54नाम है
13:57जी समाधि नाम के एक वैश्य होते हैं और वो
14:02मेधा ऋषि के आश्रम में जाते हैं एक राजा
14:05भी है राजा भी और सुरत नाम के राजा है सुर
14:08नाम राजा भूत समस्ते िति मंडले तस्य पालता
14:12समक प्रजा पुत्रा तोव प्रथम चरित्र में
14:15प्रथम अध्याय में ये कथा आती है शास्त्री
14:18जी मैं अपने कुछ ऐसे दर्शक जो कम परिचित
14:21रहे हो दुर्गा स तो अधिकांश जो ग्रंथ है
14:24वो ऐसे प्रारंभ होते है कि एक समस्या है
14:26उसकी पूर्ति की आवश्यकता है समाधान की
14:28आवश्यकता
14:29और ये दोनों जो मनुष्य अलग-अलग
14:32समाज के वर्ग से आते हैं एक तो राजा है और
14:36एक वैश्य है और उनकी जो समस्या और हमारी
14:40जो आज की समस्याए होती है वो बहुत ही
14:43समानता है यानी यह हजारों वर्षों से आया
14:46लेकिन अभी भी ऐसा होता है कि परिवार से एक
14:49ऐसा लगता है कि यह मुझे समझ नहीं पा रहे
14:52समझ नहीं पा रहे ऐसा भाव लेकर वो पहुंचा
14:54मैदा तिथि के आश्रम में और इसी प्रकार तो
14:57वो बताए क्या की समस्या है और संक्षेप में
15:02समाधान तक पहुंच पाते हैं क्या हां हा
15:05बिल्कुल समाधान में पहुंच पाते हैं और
15:07इसीलिए तो यह एक इस इस कथा से यह भी समझना
15:12आवश्यक है कि व्यक्ति के जीवन में समस्या
15:15आती है और उस समस्या
15:18से मतलब वह पीड़ित होकर के या कठिनाई से
15:23कठिन के समय में वो पहुंचता कहां है ये
15:28समस के समाधान पर डिपेंड तो बहुत सारे लोग
15:31जब उनके जीवन में कोई समस्या चिंता
15:33स्ट्रेस और कोई विषाद आता है तो वो बुरी
15:37संगत में चले जाते हैं और फिर उनका और अधा
15:40पतन होता है पर हमारी
15:43इस भगवती की य जो दुर्गा सरस्वती के प्रथम
15:47अध्याय में जो कथा आती है वो इस तरह के एक
15:50राजा है और उन्होंने सारी सारी प्रजा को
15:53उनकी जो प्रजा है जो उनका राज्य रहा सूरत
15:56नाम के राजा थे तो उन्होंने उसको अपने
15:59अपने सगी संतानों की तरह उनका पालन पोषण
16:02किया लेकिन उनके ऊपर उनके शत्रुओं ने
16:06आक्रमण किया और राजा
16:08सूरत युद्ध में हार गए और उन्हें अपना
16:12सारा राज्य का फिर वो हालांकि वो रहे तो
16:15अपने घर में राज्य में पर उन्हें वो चिंता
16:18यह हमेशा होती थी कि जिस देश में का मैं
16:21राजा था जो मेरा हाथी हुआ करता था अब वो
16:24किसी और की आज्ञा में रहता है मेरी जो
16:27सेना थी अब वो किसी और की उसम है मेरा
16:29सारा राज जाता रहा तो वो एक दिन रात्रि
16:32में अपने घर को छोड़ कर के चले गए और मेधा
16:35तिथि नाम के जो ऋषि थे उनके आश्रम में गए
16:38और उन्होंने वहां पर देखा कि एक समाधि नाम
16:42के एक वैस्य है तो समाधि नाम के वैस के
16:45साथ में भी यही हुआ कि उनकी उनकी संतानों
16:49ने या उनके परिवार ने ही उनको उपेक्षित कर
16:51दिया तो वो उपेक्षा को लेकर के वो चले गए
16:55थे जी तो मैं ऐसे कने कर रहा हूं अभी भी
16:58हम कभी-कभी ऐसे समाचार पढ़ते हैं कि बहुत
17:00बड़े उद्योगपति हैं उनके संतानों ने वो
17:05विरासत लिख दिया फिर उनको बाहर कर दिया
17:07भारत से भी एक ऐसा कुछ संदर्भ आया था तो
17:10तो मतलब मैं ये कह रहा हूं कि एकदम
17:12प्रासंगिकता है उनको भी ऐसा लगा था वैश्य
17:15को समाधि नाम के
17:18की समाधि वैस्य भी अपने सबसे उपेक्षित
17:22होकर के और वो भी मेधा तिथि ऋषि के पास गए
17:26और जब ये दोनों गए तो ने अपनी वार्तालाप
17:29एक दूसरे के साथ साझा करी और फिर वो मेधा
17:34तिथि ऋषि के पास गए तो मेधा तिथि ऋषि ने
17:38फिर कहा कि यह जो कुछ भी संसार में सृष्टि
17:41में होता है वह वह कैसे होता है कौन शक्ति
17:45है कौन चलाती है और तब उन्होंने भगवती के
17:49समस्त चरित्रों का वर्णन इनके समक्ष में
17:53किया मेधातिथि ऋषि
17:56और मेधा ऋषि ने समाधि और सुरत के लिए तो
18:00यह जो चरित्र है ये इनके प्रति मेधातिथि
18:04जी ने कहा कि ऐसे ऐसे ऐसी य सृष्टि हुई और
18:09ऐसे भगवती का वो है और वही सबको प्रेरित
18:13करती है तो हम जोसे
18:15वो स्तोत्र में गाते हैं देवी सुक्तम में
18:19कि या देवी
18:21सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
18:28देवी सर्व भूते स्मृति रूपे संता
18:34नमस्तय जो मेधातिथि ऋषि ने समझाया और उससे
18:39उन दोनों को बोध की प्राप्ति हुई और यह
18:42फिर कहा कि उन्होंने भगवती की आराधना करते
18:45हुए अपने जीवन को व्यतीत किया और फिर उस
18:49परम साक्षात्कार को प्राप्त किया भगवती के
18:53तो यह है कि उन्होंने जो खोया था उससे
18:57उससे बहुत बहुत जो परम सत्ता की प्राप्ति
19:00को प्राप्त कर पाए और वह आनंदित हो पाए तो
19:04देवी माता का जो चरित्र है वह
19:07इतना क्या कहना चाहिए सुंदर और उसकी इतनी
19:11विविधता है कि
19:14सभी देवों ने अपनी अपनी ओर से उनको कुछ
19:18उपहार के रूप में दिए और फिर वह शक्ति
19:21उनकी जो है वो तो देवी मां को अगर हम ऐसा
19:25देखें कि जो भी संसार की सं शक्तिया उन
19:29सबका एकीकृत जो स्वरूप है वो मां के रूप
19:33में पर मैं एक और भी याद कर रहा था
19:35शास्त्री हम जिस युग में रह रहे बहुत
19:36लोगों की नींद जो है वो पूरी नहीं होती है
19:39और यह भी एक समस्या है तो जो आप अभी बता
19:42रहे थे उसम य भी आता है ना या देवी
19:44सर्वभूतेषु निद्रा रूपेण संस्थिता
19:48नमस्तस्ये
19:51नमस्तस्यै भी लोरी सुनाकर मां नींद की तरफ
19:55ले जाती है और यं भी वो वाला पल जब आप
19:59चेतन से निद्रा की अवस्था में चले जाते हो
20:02कोई उसको ठीक ठीक छू नहीं सकता एक विलक्षण
20:05बात है तो यह इस थोड़ा सा मैं य ऐसे मानता
20:10हूं
20:12कि जैसे आपके पास में एक ये फोन है और आप
20:19इसको दिन भर चलाए फिर इसकी बैटरी खत्म हो
20:22जाती है तो इसको आप चार्जर में लगाते
20:27चार्ज करते हैं और फिर सेय नवीन होकर के
20:30आता है तो आप कल्पना करिए यदि इसको चार्ज
20:33ना करें तो ये डिब्बा है किसी काम का नहीं
20:36यही बात व्यक्ति को चिंतन में लानी है कि
20:40यह जो निद्रा है यह भगवती मां ही है जो
20:46आपको नित्य ही चार्ज करती है आपके जीवन
20:49में जो ऊर्जा है जो जो प्राण शक्ति है वह
20:54अपनी गोद में लेकर के इसलिए हम कहते हैं
20:57कि निद्रा दे दे तो निद्रा जो देवी है वह
21:01आपको समस्त ऊर्जा से यह इस तरह का भी है
21:05जैसे एक कोई बच्चा खाना पना खा पी करके और
21:09वो बाहर घूमने जाए खेले और करे फिर वो धूल
21:13धूस होकर के और भूखा प्यासा व्याकुल फिर
21:16वो घर आता है और उसकी जो जननी है मां है
21:20उसको फिर दुलार देती है उसको स्नान आदि
21:23कराती है फिर उसको वस्त्र इत्यादि फिर
21:25उसको पोषित करती चाहे पय पान से चाहे उसको
21:28भोजन देती है और फिर वह नवीन ऊर्जा के साथ
21:32में स्नेह भी प्राप्त करता है इसी तरह हम
21:36सबके जीवन में चाहे वह माने चाहे वह ना
21:40माने दोनों ही स्थितियों में वही जो भगवती
21:44है जिसे हम जगत जननी कहते हैं वह सबकी
21:48चाहे उसे मानने वाले लोग उसे मां की तरह
21:51स्वीकार करें और ना करें फिर भी वह जननी
21:55बिना भेद के समस्त अपनी सृष्टि की समस्त
21:59संतानों को नित्य ही अपने स्नेह वात्सल्य
22:02से दुलार हुई और सबका पोषण करती हुई फिर
22:06वह जो ऊर्जा खोई होती है पूरे दिन की फिर
22:09से उसे वापस उसको पूरी ऊर्जा के साथ में
22:14चार्ज जैसे कर देती है तो ये या देवी
22:17सर्वभूतेषु निद्रा रूपेण संस्थिता
22:22नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम इसीलिए हमारे
22:26ऋषियों ने कहा उस उस उस शक्ति को उस ऊर्जा
22:30को उस वात्सल्य स्नेह को जो हमें दिखाई तो
22:33नहीं पड़ता पर वास्तव में यदि हम देखें तो
22:36इसी तरह से वह अज्ञात में बिना दिखाए हुए
22:41हम सबको नित्य ही वह देती रहती है शक्ति
22:45इसीलिए कम से कम निति ही हम करते हैं
22:48लेकिन कम से कम इन नौ दिनों में हम उस मां
22:51के प्रति जगत जननी के प्रति कृतज्ञ हो और
22:56उसकी आराधना करते हुए उस से धन्यवाद तो हम
22:59क्या करेंगे पर उनके प्रति कृतज्ञता का
23:03भाव रखते कि हे जननी आप की जय हो जय हो जय
23:07हो बहुत-बहुत धन्यवाद है शास्त्री जी
23:09समापन करते करते मैं यह बात याद कर लूं
23:11आपके साथ कि हम जिस तरफ देखते हैं हमें
23:13वही बात दिखाई देती है कमरे में कई
23:15वस्तुएं होती हैं और हमको अगर हमारा ध्यान
23:18नहीं है तो जो हम ढूंढ रहे हैं वो पता
23:21नहीं लगता कि सामने ही है इसी प्रकार जो
23:23श्रद्धा की आंख है जो अगर जागृत होती है
23:26तो मां के दर्शन होते हैं तो हमारी
23:28श्रद्धा की आंख जागृत करने की दिशा में जो
23:30आपने अपनी ओर से अनुभूति और जो आपने बांटा
23:35है उसके लिए मैं बहुत बहुत आपका आभारी हूं
23:38और यादवी सर्वू श्रद्धा रूप संस्थिता भी
23:41है
23:52नमस्तस्ए ऐसी प्रार्थना के साथ नवरात्रि
23:55के पर्व पर बहुत बहुत सबको मंगल कामना और
23:59सबको शुभकामना सबका जीवन मंगलमय हो भगवती
24:02की कृपा सब पर है उसका हम अनुभव कर पाए
24:06बहुत-बहुत धन्यवाद नमस्कार
